भारत में कोरोना वैक्सीन बना रही दुनिया की सबसे बडी वैक्सीन निर्माता सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की बादशाहत खतरे में है। मॉडर्ना जैसी कंपनियां उसे ग्लोबल स्तर पर चुनौती दे रही हैं। वैक्सीन नेशनलिज्म, इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी कानून जैसी बाधाएं उसे आगे बढ़ने से रोक रही है। वहीं, भारत में वैक्सीन की कम होती कीमतें भी उसके मुनाफे को कम कर रही हैं। यह एक बड़ी वजह है कि सीरम के सीईओ अदार पूनावाला ने पिछले हफ्ते यूके में 2,460 करोड़ रुपए (240 मिलियन पाउंड) के निवेश की घोषणा की है।

इस घोषणा को पूनावाला के उस बयान से भी जोड़ा गया, जो उन्होंने लंदन में दिया था। उन्होंने कहा था कि भारत में वैक्सीन सप्लाई को लेकर उन पर बहुत दबाव है। मुख्यमंत्रियों और कॉर्पोरेट्स के बड़े लोग उन्हें धमका रहे हैं। यूके में निवेश और धमकी की बात जुड़ी तो भारत में इस फैसले पर कई सवाल उठे। पर एक स्वतंत्र मीडिया हाउस ने इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी के जरिए दावा किया है कि पूनावाला का निवेश अचानक या हड़बड़ी में लिया गया फैसला नहीं है बल्कि यह कंपनी के सिलसिलेवार उठाए गए स्ट्रैटजिक कदमों में से एक है।

इंडिपेंडेंट मीडिया हाउस ‘द केन’ की रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी की वजह से सबसे ज्यादा फायदा वैक्सीन और दवा बनाने वालों को हुआ है। उनमें भी दुनिया की सबसे बड़ी वैक्सीन निर्माता कंपनी सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के लिए तो यह लॉटरी लगने जैसा है जो मार्च 2020 में खत्म हुए वित्त वर्ष में घरेलू बिक्री में 40% तक की कमी का सामना कर रही थी। कोरोना ने कहीं न कहीं उसे एक बार फिर रिकवर करने की न केवल राह दिखाई, बल्कि उसकी तो जैसे लॉटरी ही लग गई। भले ही सीरम को जिस रफ्तार से कोरोना वैक्सीन बनाने और बांटने थे, उसमें उसकी फेसिलिटी में लगी आग और अन्य राजनीतिक कारणों ने अड़चनें पैदा की है, पर वह अब भी मध्यम और कम आय वाले देशों के लिए उम्मीद की एक किरण बनी हुई है।

द केन की रिपोर्ट में सीमा सिंह और आनंद कल्याणरमन ने बताया कि सीरम की इस समय वास्तविक फाइनेंशियल स्थिति क्या है? उसने यूके में निवेश का फैसला क्यों लिया है? आने वाले वर्षों में उसकी स्ट्रैटजी क्या रहने वाली है? आइए, एक-एक कर समझते हैं इन सभी सवालों के जवाबों को…

क्या यूके में निवेश की घोषणा सीरम की किसी दूरगामी योजना का हिस्सा है?

हां। काफी हद तक। द केन की रिपोर्ट के अनुसार सीरम ने वैक्सीन डोज बनाने की अपनी क्षमता को एक अरब डोज तक बढ़ा लिया है। उसने स्पाईकैचर नाम की बिल्कुल ही एक नई टेक्नोलॉजी से बनी एक और कोरोना वैक्सीन के लिए लाइसेंस हासिल किया है। इसके अलावा कंपनी जल्द ही मलेरिया की वैक्सीन भी मार्केट में लाने की तैयारी में है।

जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने घोषणा की कि सीरम 2,460 करोड़ रुपए यानी 240 मिलियन पाउंड का निवेश कर रही है तो सीईओ अदार पूनावाला के करीबी लोगों को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। पूरी दुनिया में इस समय हर देश ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन अपने लोगों के लिए चाह रहा है और इसे वैक्सीन नेशनलिज्म कहा जा रहा है। ऐसे माहौल में जेब में भरपूर कैश रखने वाली कंपनी अगर नए देशों में निवेश के अवसर तलाश रही है तो निश्चित तौर पर यह उसका लॉन्ग टर्म स्ट्रैटजिक इनवेस्टमेंट है।

इसे समझने के लिए अदार पूनावाला के ब्रिटिश अखबार द टाइम्स को दिए इंटरव्यू को पढ़ सकते हैं। पूनावाला का कहना है कि एस्ट्राजेनेका वैक्सीन को जनवरी में अप्रूवल मिला, तब तक कंपनी ने 800 मिलियन डॉलर की लागत से सालाना डोज बनाने की क्षमता को 1.5 अरब से 2.5 अरब डोज कर लिया था। छह महीनों में यह क्षमता 3 अरब डोज तक पहुंच जाएगी।

इस समय सीरम का वैल्युएशन कितना है?

70 हजार करोड़ से 1.90 लाख करोड़ रुपए तक। सीरम कोई लिस्टेड कंपनी नहीं है। उसका मालिकाना हक पूनावाला परिवार के पास है। इस वजह से वैल्युएशन निकालने के लिए अलग-अलग फॉर्मूलों का इस्तेमाल करना होगा।

मार्च 2020 में समाप्त वित्त वर्ष में कंपनी ने 41% मुनाफा कमाया। अगर इसे आधार बनाकर कैलकुलेशन करते हैं तो कंपनी का वैल्युएशन 9.5 बिलियन डॉलर (70 हजार करोड़ रुपए) होगा। अगर फार्मा इंडस्ट्री के मौजूदा औसत आंकड़ों और कंपनी के वित्त वर्ष 19-20 के मुनाफे को देखें तो वैल्युएशन 15 बिलियन डॉलर (1.10 लाख करोड़ रुपए) होगा।

महामारी के बाद वैक्सीन की मांग में बहुत वृद्धि हुई और इस हिसाब से कैलकुलेट करें तो वैल्युएशन 17 बिलियन डॉलर (1.25 लाख करोड़ रुपए) से 26 बिलियन डॉलर (1.90 लाख करोड़ रुपए) के बीच होगा। एक इंटरव्यू में संस्थापक साइरस पूनावाला ने बताया था कि कंपनी पूनावाला फैमिली की है। यानी सीरम कहीं भी और कितना भी बड़ा दांव लगा सकती है और उसे किसी निवेशक को इसके लिए जवाब नहीं देना है।

कंपनी के यूके में निवेश से जुड़े सपने पुराने हैं। महामारी ने तो कंपनी की योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने का काम ही किया है। वह ग्लोबल मार्केट या इंटरनेशनल डोनर एजेंसियों के लिए और भी बड़ी सप्लायर बनना चाहती है। आप इस बात से कल्पना कर सकते हैं कि जिस कंपनी का राजस्व वित्त वर्ष 2019-20 में 5,446 करोड़ रुपए था, उसने पिछले दो साल में 2,573 करोड़ रुपए का निवेश भविष्य की योजनाओंं में किया है।


सीरम का पूरा फोकस अभी कहां है? वह करना क्या चाहती है?

सीरम का फोकस फिलहाल नई वैक्सीन टेक्नोलॉजी डेवलप करने और उसे हासिल करने पर है। सीरम ने पिछले साल सितंबर में स्पाईबायोटेक के साथ एक्सक्लूसिव ग्लोबल लाइसेंसिंग एग्रीमेंट किया। इस स्टार्टअप कंपनी ने नई वायरस-लाइक-पार्टिकल (VLP) टेक्नोलॉजी से कोरोना वैक्सीन बनाई है, जिसके ट्रायल्स ऑस्ट्रेलिया में शुरू हुए हैं।

स्पाईबायोटेक के सीईओ सुमी बिस्वास भारतीय मूल की हैं। 2017 से वो स्पाईकैचर टेक्नोलॉजी विकसित कर रही थीं और अब जाकर उसे गति मिली है। सुमी खुद भी ऑक्सफोर्ड में पढ़ी हैं और उनके स्टार्टअप ने फरवरी में 32.5 मिलियन डॉलर यानी करीब 240 करोड़ रुपए का निवेश भी जुटाया है। सीरम का इस कंपनी से लाइसेंसिंग एग्रीमेंट भविष्य में कंपनी के लिए कई नए रास्ते खोलता है।

दरअसल, स्पाईबायोटेक की "बैक्टीरियल सुपरग्लू टेक्नोलॉजी" कैंसर समेत कई संक्रामक रोगों के इलाज में इस्तेमाल हो सकती है। कोरोना की बात करें तो स्पाईबायोटेक का टीका सैकड़ों वॉलंटियर पर आजमाया जा रहा है।

सीरम ने एक और इंस्टीट्यूट पर दांव लगाया है और वह है - ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का जेनर इंस्टीट्यूट। यह वैक्सीन रिसर्च का पावर हाउस है। जेनर ने ही एस्ट्राजेनेका के साथ मिलकर कोवीशिल्ड को विकसित किया, जिसके एक अरब डोज बनाने की डील सीरम ने की है।

मूल रूप से कोलकाता सूमी बिस्वास की स्पाई बायोटेक ने नई टेक्नोलॉजी विकसित की है। सूमी खुद भी ऑक्सफोर्ड में मलेरिया वैक्सीन को डेवलप करने वाली टीम का हिस्सा रही है। उनकी कोरोना वैक्सीन के इस समय ऑस्ट्रेलिया में ट्रायल्स चल रहे हैं।
मूल रूप से कोलकाता सूमी बिस्वास की स्पाई बायोटेक ने नई टेक्नोलॉजी विकसित की है। सूमी खुद भी ऑक्सफोर्ड में मलेरिया वैक्सीन को डेवलप करने वाली टीम का हिस्सा रही है। उनकी कोरोना वैक्सीन के इस समय ऑस्ट्रेलिया में ट्रायल्स चल रहे हैं।
पिछले हफ्ते, जेनर की टीम ने दावा किया कि उसकी मलेरिया वैक्सीन कैंडीडेट ट्रायल्स में 77% इफेक्टिव रही है। यह पहली बार है कि जब किसी मलेरिया वैक्सीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन के 75% इफेक्टिवनेस के लक्ष्य को पार किया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि मलेरिया की वैक्सीन सीरम ही बनाने वाली है।

कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के साथ काम करने वाले एक वैक्सीन स्पेशलिस्ट का कहना है कि सीरम की लॉटरी लग गई है। जेनर और ऑक्सफोर्ड उसके लिए काम कर रहे हैं। पुणे की फेसिलिटी यूके के रेगुलेटर MHRA (मेडिसिन्स एंड हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी) से अप्रूव्ड हैं। यह सब मिलकर सीरम के लाभ को कई गुना बढ़ाने वाले हैं।

सीरम के सामने भारत से बाहर जाने की क्या मजबूरी थी?

पूनावाला की कंपनी के रेवेन्यू टारगेट्स भारत में पूरे नहीं हो सकते थे। मार्च 2020 में खत्म हुए वित्तीय वर्ष में सीरम की घरेलू आय 31% कम हुई थी, जो इसके पिछले साल 63% बढ़ी थी। इसकी भरपाई एक्सपोर्ट ने की, जो 19% बढ़ा। इससे कुल राजस्व 4% अधिक रहा।

इसकी वजह है- भारत में वैक्सीन की कीमतें दुनिया में सबसे कम होना। सीरम को अपने प्रमुख प्रोडक्ट्स के लिए भारतीय टेंडर में कीमत कम मिल रही है। सीरम के लिए अच्छी बात यह है कि दुनियाभर में सबसे महंगी कोरोना वैक्सीन भारत में ही है। पेंटावेलेंट और रोटावायरस वैक्सीन से भी सीरम को बहुत ज्यादा लाभ नहीं हुआ है। सीरम के एकाधिकार वाले मीजल्स-रुबेला वैक्सीन की कीमतें जरूर उसे फायदा पहुंचा रही है।

बच्चों के लिए वैक्सीन बनाने वाली कंपनी को अगर भारत में फायदा नहीं हो रहा है तो यह उसके लिए एक बड़ी चेतावनी और चुनौती दोनों है। वैक्सीन नेशनलिज्म इतना हावी है कि कोवैक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों में वह वैक्सीन सप्लाई नहीं कर पा रही है और यह उसके लिए परेशानी का सबब बन सकता है।

अगर पिछले साल की बात करें तो पूनावाला ने गति दिखाकर ही बड़े ऑर्डर जुटाए और लाभ कमाया। जब बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (BMGF) गावी, द वैक्सीन अलायंस के लिए सप्लायर तलाश रहा था, तब डील करने में अदार ने देरी नहीं की। इस डील के तहत 90 देशों में कोरोना वैक्सीन सप्लाई होनी है। इस डील के हिसाब से 3 डॉलर/डोज की दर पर एस्ट्राजेनेका या नोवावैक्स की वैक्सीन के 20 करोड़ डोज सप्लाई करने थे। फाउंडेशन ने 10 करोड़ डोज के लिए आधी कीमत के तौर पर 15 करोड़ डॉलर का भुगतान भी कर दिया था। वैक्सीन फेल हो जाती तो सीरम और BMGF दोनों को नुकसान होता। पर वैक्सीन सफल रही और जो भुगतान मिला था वह सप्लाई के लिए एडवांस माना गया। इसका फायदा सीरम को मिला।

सीरम को यूके में फेसिलिटी खोलने से क्या लाभ मिलेगा?

यूके में फेसिलिटी खोलने से सीरम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपस्थिति मिलेगी। बड़ी बायो टेक्नोलॉजी कंपनियां भारत में लाइसेंस लेने में घबराती हैं। खासकर इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी से जुड़े कानून और मुकदमेबाजी की वजह से। भारत में प्रक्रिया भी इतनी धीमी है कि अप्रूवल्स में अधिक समय लग जाता है। ऐसे में सीरम के लिए यूके में लाइसेंस हासिल करना और ऑर्डर हासिल करना आसान हो जाएगा।

सीरम को दूरगामी फैसले भी लेने हैं। इसमें नई टेक्नोलॉजी को अपनाना अहम होगा। स्पाईबायोटेक प्लेटफॉर्म के लिए डील इस दिशा में एक अहम कदम है। कंपनी मैसेजर आरएनए (mRNA) टेक्नोलॉजी से ज्यादा दिन तक दूर नहीं रह सकेगी, जिसमें फाइजर और मॉडर्ना इस समय वर्ल्ड लीडर हैं। इन दोनों ही कंपनियों के कोरोना वैक्सीन सबसे पहले आए और ज्यादातर देशों में लगाए जा रहे हैं। mRNA टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कोरोना के विकसित हो रहे स्ट्रेन के लिए इसे अपडेट करना आसान है। अन्य टेक्नोलॉजी के वैक्सीन में अपडेशन एक लंबी प्रक्रिया होगी।

सीरम को अपनी ग्लोबल स्ट्रैटजी में भी बदलाव लाना होगा। जिस मॉडर्ना को बड़े स्तर पर प्रोडक्शन का अनुभव नहीं था, उसने भी हाल ही में गावी के 50 करोड़ डोज सप्लाई करने की डील हासिल की है। जाहिर है कि सीरम को आने वाले दिनों में दुनियाभर में इसी तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। यूके में उसका होना इन चुनौतियों से निपटने में उसकी मदद करेगा।

‘द केन’ की रिपोर्ट में एक बायोटेक कंपनी के हवाले से दावा किया गया है कि अगले दो साल तक अदार पूनावाला को कोरोना वैक्सीन के सिवा कुछ और करने का वक्त नहीं मिलेगा। पर उसके बाद उनके पास इतना पैसा होगा कि वह जो चाहेंगे, उसे हासिल कर सकेंगे।


क्या सीरम ने अपने आपको सिर्फ वैक्सीन तक सीमित रखा है?

नहीं। पूनावाला फैमिली ने सीरम इंस्टीट्यूट के जरिए और भी उद्योगों में निवेश किया है। एविएशन और क्लीन एनर्जी बिजनेस से भी कमाई शुरू हो गई है। कंपनी की कॉर्पोरेट फाइलिंग के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कई सहायक कंपनियों को उसने जोड़ा है। मार्च 2020 में सहायक कंपनियों की संख्या दोगुनी होकर आठ हो गई थी।

भारत में सीरम ग्रुप ने फिनटेक और विंड एनर्जी जैसे क्षेत्रों में भी निवेश किया है। इसका एविएशन बिजनेस अब प्रॉफिट में है। 118 करोड़ रुपए की कमाई पर बिजनेस से 6.53 करोड़ रुपए का लाभ कमाया। क्लीन एनर्जी बिजनेस ने 73 करोड़ रुपए का राजस्व 2019-20 में कमाया।

दो साल पहले पूनावाला फाइनेंस ने होल्डिंग कंपनी राइजिंग सन होल्डिंग प्रा.लि. के जरिए नए बिजनेस में प्रवेश किया। अदार पूनावाला की व्यक्तिगत रुचि की वजह से कंपनी ने नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनी मैग्मा फिनकॉर्प में 3,456 करोड़ रुपए में 60% हिस्सेदारी खरीदी। कंपनी के पास कैश की कमी नहीं है और छोटे, मध्यम स्तर के और बड़े कर्ज देकर कंपनी लंबी अवधि में अच्छी कमाई कर सकती है।