होलाष्टक शुरु होने जा रहा है और इसकी शुरुआत 2 मार्च से होगी जो कि नौ मार्च तक रहेगी। ऐसी मान्यता है कि इस दौरान शुभ और मांगलिक कार्य बिल्कुल भी नहीं किए जाते हैं। और गलती से भी कोई इस अवधि में यदि कोई ऐसा करता है तो उसे भारी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

होलाष्टक दो मार्च यानी कि सोमवार को दोपहर 12:52 बजे से शुरु हो रहा है और यह नौ मार्च को समाप्त हो जाएगा । फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक दोष रहेगा जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित रहेंगे। वहीं, हमारे भारतीय मुहूर्त विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस अवधि में विशेष रूप से विवाह, नए निर्माण व नए कार्यों को आरंभ भूलकर भी नहीं करना चाहिए।
ज्योतिष शास्त्र के कथन के अनुसार - इन दिनों में किए गए कार्यों से कष्ट, अनेक पीड़ाओं की आशंका बनी रहती है। विवाह आदि संबंध विच्छेद और कलह का शिकार हो जाते हैं या फिर अकाल मृत्यु का खतरा या बीमारी होने की आशंका भी बढ़ जाती है।

होलाष्टक का अर्थ -

होली के आठ दिन पूर्व से ही होलाष्टक की शुरुआत हो जाती है । होलाष्टक शब्द जो है वह होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है , जिसका अर्थ होता है होली के आठ दिन। होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी से शुरू होकर फाल्गुन शुक्ल पक्ष पूर्णिमा तक रहता है।
यही नहीं, अष्टमी तिथि से शुरू होने के कारण भी इसे होलाष्टक कहकर बुलाया जाता है । कहते हैं कि होली आने की पूर्व सूचना होलाष्टक से ही मिलती है और इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरू हो जाती हैं।

होलाष्टक के दौरान उग्र रहते हैं ग्रह -

ध्यान रहे कि होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्त्रस्, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में रहते हैं । इन ग्रहों के उग्र होने के कारण मनुष्य के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर हो जाती है, जिसके कारण कई बार उससे गलत निर्णय भी हो जाते हैं। जान लें कि जिनकी कुंडली में नीच राशि के चंद्रमा और वृश्चिक राशि के जातक या चंद्र छठे या आठवें भाव में मौजूद हो उन्हें इन दिनों अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है।

होलाष्टक की शुरुआत होते ही प्राचीन काल में होलिका दहन वाले स्थान की गोबर, गंगाजल आदि से लिपाई की जाती थी। साथ ही वहां पर होलिका का डंडा भी लगा दिया जाता था ।

होलाष्टक में क्या करते हैं -

जैसा कि हमने पहले बताया कि माघ पूर्णिमा से होली की तैयारियां शुरू हो जाती है। होलाष्टक आरंभ होते ही दो डंडों को स्थापित किया जाता है. यहां एक डंडा होलिका का प्रतीक माना जाता है तो दूसरा प्रह्लाद । ऐसा माना जाता है कि होलिका से पूर्व 8 दिन दाह-कर्म की तैयारी कर ली जाती है।

होली से जुड़ी कथाएं, यहां जानें -

दरअसल, जब प्रह्लाद को नारायण भक्ति से विमुख करने के सभी उपाय निष्फल होने लगे तो हिरण्यकश्यप ने प्रहलाद को फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ही बंदी बना लिया था और उन्हें यातनाएं देने लगा।

वहीं, उसे मारने के लिए रोज अनेक उपाय किए जाने लगे लेकिन भगवत भक्ति में लीन प्रहलाद हमेशा जीवित बच जाया करते थे। इस तरह सात दिन बीत गए। आठवें दिन भाई हिरण्यकश्यप की परेशानी देख बहन होलिका (ब्रह्मा द्वारा अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था) ने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में भस्म करने का प्रस्ताव रखा।

आश्चर्य में सब तब पड़ गए जब वहां मौजूद लोगों ने देखा कि होलिका जैसे ही भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर जलती आग में बैठी तो वहीं जलने लग गई। प्रहलाद पुन: जीवित बच गए जबकि होलिका जल गई। इन्हीं आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है।

हमारे ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है कि भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के अपराध में कामदेव को शिव जी ने फाल्गुन की अष्टमी में भस्म कर दिया था। कामदेव की पत्नी रति ने उस समय क्षमा याचना की और भगवान शिव ने कामदेव को पुन: जीवित करने का आश्वासन दिया. बस इसी खुशी में लोग रंग खेला करते हैं।